15 लाख की पुलिया या भ्रष्टाचार का पुल? 5 महीने में ही टूटने की कगार पर निर्माण!
ग्राम पंचायत कुम्हेडिन के मुसरा ग्राम में डीएमएफ फंड से करीब 15 लाख रुपये की लागत से बनी पुलिया निर्माण के महज 4-5 महीने में ही सवालों के घेरे में है। पुलिया की छत में गिट्टी और सरिया बाहर दिखाई देने के साथ कैप बीम की स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों ने निष्पक्ष तकनीकी जांच और कोर कटिंग की मांग की है।
अतुल सिंह बघेल / मध्यप्रदेश
करीब 15 लाख की डीएमएफ पुलिया 4-5 महीने में जर्जर! गिट्टी-सारिया बाहर, कैप बीम पर भी उठे सवाल
शहडोल। जनपपद पंचायत बुढ़ार अंतर्गत ग्राम पंचायत कुम्हेडिन के मुसरा ग्राम में डीएमएफ फंड से करीब 15 लाख रुपये की लागत से बनाई गई पुलिया निर्माण के महज 4 से 5 महीने के भीतर ही सवालों के घेरे में आ गई है। मौके की तस्वीरें पुलिया की निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। पुलिया की छत के निचले हिस्से में क्रांक्रीट के बीच गिट्टी स्पष्ट रूप से बाहर दिखाई दे रही है, वहीं कई स्थानों पर सरिया भी नजर आ रहा है।
पुलिया के महत्वपूर्ण हिस्से कैप बीम की स्थिति को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है। मौके की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि निर्माण में गुणवत्ता मानकों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह पुलिया उनकी बस्ती को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग है और यदि समय रहते इसकी तकनीकी जांच नहीं कराई गई तो भविष्य में किसी अप्रिय घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, यह बड़ा सवाल है।
तकनीकी अमले की भूमिका पर भी सवाल
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि ठेकेदार के प्रभाव और राजनीतिक पहुंच के चलते निर्माण कार्य में कथित तौर पर मनमानी हुई तथा तकनीकी अमले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। खास बात यह है कि क्षेत्र में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। अब यह पुलिया भी उन सवालों का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बनती दिखाई दे रही है।
जब इस संबंध में उपयंत्री चंद्रमौली दुबे से सवाल किया गया तो उनका कहना था कि पुलिया बहुत अच्छी और मजबूत बनी है। हालांकि, इस बयान के अगले ही दिन पुलिया पर मरम्मत अथवा लीपापोती जैसा कार्य कराए जाने की तस्वीरें सामने आई हैं। तस्वीर में मजदूर पुलिया के प्रभावित हिस्से पर काम करते दिखाई दे रहे हैं।
बयान के अगले दिन मरम्मत क्यों?
यदि पुलिया निर्माण पूरी तरह गुणवत्तापूर्ण और मजबूत था, तो सवाल उठता है कि खबर के बाद अगले ही दिन पुलिया पर लीपापोती अथवा सुधार कार्य की आवश्यकता क्यों पड़ी? यही तस्वीरें अब पूरे मामले को और गंभीर बना रही हैं। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या निर्माण में सामने आई कमियों को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है?
कोर कटिंग से सामने आ सकती है वास्तविक गुणवत्ता
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मांग अब पुलिया की निष्पक्ष तकनीकी जांच और कोर कटिंग की है। यदि संबंधित विभाग के बजाय किसी स्वतंत्र सक्षम तकनीकी एजेंसी से पुलिया की जांच कराई जाए, तो निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, कंक्रीट की गुणवत्ता और निर्धारित तकनीकी मानकों के पालन की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
करीब 15 लाख रुपये के डीएमएफ फंड से बनी यह पुलिया यदि वास्तव में निर्माण के कुछ ही महीनों में कमजोर स्थिति में पहुंच गई है, तो यह केवल सरकारी धन के उपयोग का मामला नहीं बल्कि उस मार्ग से गुजरने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इस मामले में मौके की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराता है या फिर पुलिया पर की गई लीपापोती के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
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