आए राम जी, गए राम जी! विकसित भारत ग्रामीण योजना में मजदूरी भुगतान के लिए तरसते मजदूर
विकसित भारत ग्रामीण योजना के तहत समय पर मजदूरी भुगतान के दावों के बावजूद शहडोल जिले में मजदूर भुगतान का इंतजार कर रहे हैं। मजदूरों ने काम कराने के बावजूद समय पर भुगतान नहीं मिलने का आरोप लगाया है। वहीं योजना के क्रियान्वयन, मजदूरों की डिमांड और कर्मचारियों के वेतन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
अतुल सिंह बघेल / मध्यप्रदेश
विकसित भारत ग्रामीण योजना में मजदूरी भुगतान के लिए तरसते मजदूर
शहडोल। विकसित भारत ग्रामीण योजना के तहत मजदूरों को समय पर मजदूरी भुगतान का दावा जमीनी स्तर पर सवालों के घेरे में नजर आ रहा है। योजना के तहत 1 जुलाई 2026 से प्रत्येक सप्ताह मजदूरी भुगतान की व्यवस्था का दावा किया गया था, लेकिन शहडोल जिले में कई मजदूरों का कहना है कि काम करने के बावजूद उन्हें अब तक मजदूरी का भुगतान नहीं मिला है।
लगभग दो माह बीतने के बाद भी मजदूर अपने भुगतान की जानकारी के लिए बैंक और संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। मजदूरों का आरोप है कि उनसे लगातार काम तो कराया जा रहा है, लेकिन भुगतान कब होगा, इसकी स्पष्ट जानकारी उन्हें नहीं दी जा रही है।
योजना को सफल दिखाने के लिए मजदूरों की डिमांड का दबाव?
योजना के क्रियान्वयन को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में एक और गंभीर सवाल उठ रहा है। आरोप है कि मैदानी स्तर पर कर्मचारियों पर अधिक से अधिक मजदूरों की डिमांड लगाने का दबाव बनाया जा रहा है। कुछ ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि कागजों में मजदूरों की संख्या बढ़ाकर योजना की प्रगति दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
मजदूरों ने बताई अपनी परेशानी
मजदूरों का कहना है कि सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक द्वारा काम के लिए लगातार कहा जा रहा है, लेकिन मजदूरी भुगतान को लेकर कोई स्पष्ट तारीख नहीं बताई जा रही। मजदूरों का कहना है कि रोजमर्रा के खर्च और परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी ही मुख्य आय का साधन है। ऐसे में भुगतान में देरी से आर्थिक परेशानियां बढ़ रही हैं।
भुगतान नहीं तो पलायन का बढ़ता संकट
ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी भुगतान में देरी का असर मजदूरों के पलायन पर भी पड़ने की बात सामने आ रही है। मजदूरों का कहना है कि जब स्थानीय स्तर पर समय पर मजदूरी नहीं मिलती तो उन्हें रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों और राज्यों की ओर जाना पड़ता है।
कर्मचारियों के वेतन को लेकर भी उठ रहे सवाल
योजना के क्रियान्वयन में लगे कर्मचारियों के वेतन भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ग्रामीणों और कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि जब योजना में मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं मिल पा रहा है तो योजना के संचालन और भविष्य की स्थिति को लेकर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर?
योजना शुरू करते समय समयबद्ध मजदूरी भुगतान को लेकर किए गए दावों के बावजूद यदि मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं मिलता है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन मजदूरों की शिकायतों पर क्या संज्ञान लेता है और लंबित मजदूरी भुगतान को लेकर क्या कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल मजदूरों की नजर अपने बैंक खातों पर है और सवाल यही है—आखिर उनकी मेहनत की मजदूरी कब आएगी?
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