“जाँच भी अपनी, जाँचकर्ता भी अपना! सरपंच साहब बोले—पहले रिपोर्ट आने दो, पसंद न आए तो फिर जाँच करा देंगे!”
ग्राम पंचायत केशवाही में पुलिया एवं स्ट्रीट लाइट से जुड़े कार्यों की शिकायत में उपयंत्री अमन मंसूरी की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। इसके बावजूद जाँच की जिम्मेदारी उन्हीं को दिए जाने पर शिकायतकर्ता ने निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। जनपद CEO का कहना है कि पहले प्रतिवेदन आने दिया जाए, असंतुष्ट होने पर पुनः जाँच कराई जा सकती है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब शिकायत में संबंधित अधिकारी की भूमिका पर ही प्रश्न हैं, तो स्वतंत्र जाँच के बजाय पहले उन्हीं से प्रतिवेदन क्यों लिया जा रहा है और शिकायत को दो चरणों में लंबा खींचने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
अतुल सिंह बघेल | शहडोल
शहडोल। जनपद पंचायत बुढ़ार के ग्राम पंचायत केशवाही में पुलिया एवं स्ट्रीट लाइट से जुड़े कार्यों को लेकर की गई शिकायत अब एक नए और गंभीर सवाल पर आकर टिक गई है। शिकायतकर्ता द्वारा कार्यों एवं संबंधित जिम्मेदारों की भूमिका पर सवाल उठाए जाने के बाद जाँच की जिम्मेदारी ऐसे अधिकारी को सौंपे जाने पर आपत्ति जताई जा रही है, जिसकी भूमिका पहले से उसी व्यवस्था से जुड़ी बताई जा रही है।
‘चौकीदार ही जाँचकर्ता’ तो फिर सच का पहरेदार कौन?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली और निगरानी को लेकर शिकायत की गई, उसी से जुड़े व्यक्ति को जाँच की जिम्मेदारी देना जाँच की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सवाल यह है कि जाँच अधिकारी क्या उन्हीं कार्यों, रिकॉर्ड और प्रक्रिया की स्वतंत्र जाँच करेंगे, जिनसे उनका पूर्व संबंध रहा है? यदि जाँच अधिकारी की पहले से कोई भूमिका रही है, तो क्या वह अपने ही अधीन हुई प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा कर पाएंगे?
अब सवाल जाँच अधिकारी से आगे बढ़कर जनपद सरपंच तक
मामले में जाँच अधिकारी की नियुक्ति करने वाले सरपंच की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि शिकायत की प्रकृति को देखते हुए किसी स्वतंत्र अधिकारी से जाँच कराने के बजाय उसी व्यवस्था से जुड़े अधिकारी को जाँच सौंपने का निर्णय आखिर किस आधार पर लिया गया?
यदि वास्तव में शिकायत में लगाए गए आरोप निराधार हैं, तो फिर स्वतंत्र अधिकारी से जाँच कराने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए? और यदि आरोपों की निष्पक्ष जाँच करानी है, तो ऐसी नियुक्ति क्यों की गई, जिससे पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठने लगे?
भ्रष्टाचार की जाँच या ‘अपनों’ की जाँच?
पुलिया एवं स्ट्रीट लाइट के कार्यों से जुड़े आरोपों की सच्चाई जाँच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन उससे पहले जाँच की प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ गई है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि ऐसी जाँच व्यवस्था से वास्तविक अनियमितताओं की तह तक पहुँचने के बजाय मामले को विभागीय स्तर पर ही सीमित करने का रास्ता खुल सकता है। यही वजह है कि अब मांग उठ रही है कि वर्तमान जाँच व्यवस्था पर पुनर्विचार कर ऐसे स्वतंत्र एवं वरिष्ठ अधिकारी से जाँच कराई जाए, जिसका संबंधित कार्यों अथवा जिम्मेदार व्यक्तियों से प्रत्यक्ष संबंध न हो।
सवाल सीधा है—जाँच चाहिए या सिर्फ जाँच का दिखावा?
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह शिकायत में उठाए गए आरोपों की निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जाँच कराएगा या फिर ऐसी व्यवस्था को ही आगे बढ़ाएगा, जिसमें शिकायत की जाँच उन्हीं लोगों के दायरे में होती रहे जिनकी भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
क्योंकि जब चौकीदार ही जाँचकर्ता बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है—आखिर सच की रखवाली कौन करेगा?
मामले को लेकर जब जनपद सीईओ (सरपंच साहब)से चर्चा की गई तो उनका कहना था कि पहले उपयंत्री अमन मंसूरी का प्रतिवेदन आने दिया जाए। यदि शिकायतकर्ता प्रतिवेदन से असंतुष्ट होता है, तो उसके बाद पुनः जाँच कराई जा सकती है।
लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब शिकायत के मुख्य बिंदुओं की जाँच के लिए उसी अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई है, जिसकी भूमिका पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं, तो फिर पहले उसी अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार क्यों?
शिकायतकर्ता का सीधा सवाल है—“अगर बाद में पुनः जाँच ही करानी है, तो शिकायत को पहले ही स्वतंत्र अधिकारी से जाँच क्यों नहीं कराई गई? क्या एक ही शिकायत को पहले एक ऐसे अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार कराकर, फिर पुनः जाँच के नाम पर लंबा खींचना उचित है?”
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