₹24 हजार का ‘सोख पिट’ या सरकारी धन की कब्र? चाका में निर्माण की जमीनी तस्वीर ने खोली तकनीकी स्वीकृति की पोल
बुढ़ार जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत चाका में ई-पंचायत कक्ष के सामने ₹24 हजार की लागत से बनाए गए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सोख पिट को पंचायत दर्पण पोर्टल पर पूर्ण दर्ज किया गया है। मौके पर ढांचा टूटा, धंसा और मिट्टी से भरा मिला। जनसत्ता एक्सपोज की लगातार पड़ताल में सामने आ रहे ऐसे मामलों के बीच तकनीकी स्वीकृति, निरीक्षण, माप पुस्तिका और भुगतान प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की जरूरत सामने आई है।
जनसत्ता एक्सपोज की लगातार पड़ताल के बीच सामने आया नया मामला, ई-पंचायत कक्ष के सामने बने रेन वाटर हार्वेस्टिंग ढांचे की हालत बदहाल
अतुल सिंह बघेल | शहडोल
शहडोल। बुढ़ार जनपद पंचायत क्षेत्र में विकास कार्यों की तकनीकी स्वीकृति और निर्माण गुणवत्ता को लेकर जनसत्ता एक्सपोज की लगातार पड़ताल के बीच ग्राम पंचायत चाका से सामने आई तस्वीरें सरकारी विकास कार्यों की जमीनी हकीकत का जीता-जागता सबूत बनकर सामने आई हैं।
मामला ग्राम पंचायत चाका के ई-पंचायत कक्ष के सामने बनाए गए Rain Water Harvesting यानी सोख पिट का है। पंचायत दर्पण पोर्टल पर दर्ज जानकारी के अनुसार इस कार्य की लागत ₹24,000 है। कार्य 5वें राज्य वित्त आयोग के अंतर्गत दर्ज है, जिसकी स्वीकृति दिनांक 24 जनवरी 2026 बताई गई है। कार्य एजेंसी ग्राम पंचायत चाका है और पोर्टल पर कार्य पूर्ण दर्ज है।
लेकिन मौके पर पहुंचने पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।
रिकॉर्ड में पूर्ण, जमीन पर टूटा-धंसा ढांचा
मौके पर पूरा ढांचा टूट चुका है
यानी सरकारी रिकॉर्ड में जिस निर्माण को पूर्ण दर्ज किया गया है, उसकी वर्तमान जमीनी स्थिति खुद निर्माण की गुणवत्ता और निरीक्षण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करने के बजाय उसकी वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करती है।
जनसत्ता एक्सपोज पहले भी उठा चुका है तकनीकी स्वीकृति का मुद्दा
बुढ़ार जनपद पंचायत क्षेत्र में यह पहला मामला नहीं है। जनसत्ता एक्सपोज की टीम द्वारा लगातार जिले में विकास कार्यों की तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका, निर्माण गुणवत्ता और मौके की वास्तविक स्थिति को लेकर पड़ताल की जा रही है।
सकरा पंचायत में पुलिया और बाउंड्रीवाल के निर्माण तथा केशवाही क्षेत्र के विभिन्न निर्माण कार्यों में भी तकनीकी गुणवत्ता को लेकर जनसत्ता एक्सपोज द्वारा सवाल उठाए जा चुके हैं।
अब चाका का यह रेन वाटर हार्वेस्टिंग निर्माण उसी कड़ी में सामने आया है, जहां कागजी रिकॉर्ड और मौके की तस्वीर के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
तकनीकी उपयंत्री अमन मंसूरी की भूमिका भी जांच के दायरे में
इन मामलों में तकनीकी उपयंत्री अमन मंसूरी के कार्यक्षेत्र से जुड़े निर्माणों की तकनीकी जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सवाल यह है कि जिन निर्माण कार्यों को तकनीकी प्रक्रिया के तहत स्वीकृति, माप और पूर्णता मिली, उनके वास्तविक निर्माण की गुणवत्ता का परीक्षण किस स्तर पर किया गया।
यदि किसी कार्य का तकनीकी निरीक्षण किया गया है, तो माप पुस्तिका में दर्ज कार्य की मात्रा और मौके पर मौजूद निर्माण का भौतिक सत्यापन होना चाहिए।
कमीशनखोरी के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
बुढ़ार जनपद में विभिन्न विकास कार्यों को लेकर सामने आ रहे मामलों के बीच कमीशनखोरी के आरोप भी उठ रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। यदि भुगतान और तकनीकी प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
चाका का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां ₹24 हजार की राशि से बने कार्य का सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है और उसके साथ मौके की तस्वीर भी मौजूद है।
अब दस्तावेजों का मौके से मिलान जरूरी
इस पूरे मामले में माप पुस्तिका, तकनीकी स्वीकृति, मूल्यांकन पत्रक, भुगतान वाउचर, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र और पोर्टल पर अपलोड जियो-टैग तस्वीरों का मौके पर मौजूद निर्माण से मिलान कराया जाना चाहिए।
साथ ही बुढ़ार जनपद की अन्य ग्राम पंचायतों में तकनीकी अमले के माध्यम से स्वीकृत और पूर्ण किए गए कार्यों का भी स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया जाना चाहिए।
जनसत्ता एक्सपोज का सवाल
जब ₹24 हजार के एक छोटे से सोख पिट की जमीनी हालत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पूर्ण कार्य से इतनी अलग दिखाई दे रही है, तो बड़े बजट के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हो रही है?
चाका की तस्वीर सिर्फ एक निर्माण की तस्वीर नहीं, बल्कि तकनीकी स्वीकृति से लेकर निरीक्षण और भुगतान तक की पूरी व्यवस्था के स्वतंत्र परीक्षण की जरूरत का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
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