₹24 हजार का ‘सोख पिट’ या सरकारी धन की कब्र? चाका में टूटा निर्माण बना तकनीकी व्यवस्था का जीता-जागता सबूत
बुढ़ार जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत चाका में ₹24 हजार की लागत से बने रेन वाटर हार्वेस्टिंग यानी सोख पिट की जमीनी हालत ने निर्माण गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना पर्याप्त बेस के बना ढांचा टूटकर धंस गया है, जबकि पंचायत दर्पण पर कार्य पूर्ण दर्ज है। संबंधित इंजीनियर नीलिमा श्रीवास्तव के कार्यक्षेत्र से जुड़े खरला पंचायत के करीब ₹15 लाख के स्टॉप डैम में भी गुणवत्ता संबंधी शिकायत के बाद कार्यवाही नहीं होने का आरोप है। जनसत्ता एक्सपोज की पड़ताल में अब संबंधित पंचायतों के निर्माण कार्यों के स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन की मांग उठ रही है।
अतुल सिंह बघेल / मध्यप्रदेश
जनसत्ता एक्सपोज की लगातार पड़ताल में तकनीकी स्वीकृति और निर्माण गुणवत्ता पर फिर गंभीर सवाल | खरला पंचायत के करीब ₹15 लाख के स्टॉप डैम में गुणवत्ता शिकायत के बाद भी कार्यवाहि नहीं होने का आरोप
अतुल सिंह बघेल | जनसत्ता एक्सपोज, शहडोल
शहडोल। बुढ़ार जनपद पंचायत क्षेत्र में विकास कार्यों की गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी को लेकर जनसत्ता एक्सपोज की लगातार पड़ताल के बीच ग्राम पंचायत चाका से सामने आई तस्वीरें एक बार फिर पूरी व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने ला रही हैं। मामला महज ₹24 हजार के एक सोख पिट का नहीं है, बल्कि तकनीकी स्वीकृति, निर्माण, निरीक्षण, माप पुस्तिका और भुगतान की पूरी प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्राम पंचायत चाका में ई-पंचायत कक्ष के सामने बनाए गए Rain Water Harvesting यानी वर्षा जल संचयन/सोख पिट की पंचायत दर्पण में लागत ₹24,000 दर्ज है। रिकॉर्ड के अनुसार कार्य 5वें राज्य वित्त आयोग के अंतर्गत स्वीकृत हुआ और 24 जनवरी 2026 को स्वीकृति दर्ज है। कार्य एजेंसी ग्राम पंचायत चाका है तथा पोर्टल पर कार्य पूर्ण दर्ज है।
लेकिन मौके की तस्वीर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पूर्णता से बिल्कुल अलग कहानी बयां करती है।
बिना मजबूत बेस का निर्माण, अब टूटकर बिखरा सोख पिट
मौके पर मौजूद सोख पिट के ढांचे में टूट-फूट स्पष्ट दिखाई देती है। निर्माण के नीचे पर्याप्त मजबूत बेस दिखाई नहीं देता और ढांचा धंसने की स्थिति में है। पिट के भीतर मिट्टी भर गई है तथा आसपास झाड़ियां उग आई हैं। पंचायत भवन की दीवार के पास भी मिट्टी का कटाव दिखाई दे रहा है।
यही तस्वीर इस निर्माण की गुणवत्ता का प्रत्यक्ष जमीनी प्रमाण है।
सरकारी रिकॉर्ड में कार्य पूर्ण दर्ज है, लेकिन मौके पर निर्माण की वर्तमान स्थिति यह बताने के लिए पर्याप्त है कि निर्माण की गुणवत्ता और उसकी तकनीकी निगरानी की स्वतंत्र जांच क्यों जरूरी है।
इंजीनियर नीलिमा श्रीवास्तव के कार्यक्षेत्र पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में संबंधित इंजीनियर नीलिमा श्रीवास्तव की भूमिका भी जांच का विषय बनती है। खासकर इसलिए क्योंकि जनसत्ता एक्सपोज की पड़ताल में उनके कार्यक्षेत्र से जुड़े अन्य निर्माण कार्यों को लेकर भी गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की जानकारी सामने आई है।
खरला ग्राम पंचायत में लगभग ₹15 लाख की लागत से बनाए गए स्टॉप डैम के निर्माण में भी गुणवत्ता को लेकर शिकायत किए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि शिकायत के बावजूद अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
यदि खरला के स्टॉप डैम में गुणवत्ता संबंधी शिकायत प्राप्त हुई थी, तो उस पर हुई जांच, तकनीकी परीक्षण, माप पुस्तिका, मूल्यांकन और भुगतान की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।
खरला से चाका तक—क्या शिकायतों का भी कोई हिसाब है?
एक ओर करीब ₹15 लाख के स्टॉप डैम में गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आती है और दूसरी ओर चाका में ₹24 हजार का सोख पिट टूटे और धंसे स्वरूप में सामने आता है।
दोनों मामलों की प्रकृति और लागत अलग है, लेकिन दोनों मामलों में एक महत्वपूर्ण बिंदु समान है—निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी।
यही वजह है कि अब केवल किसी एक निर्माण की जांच पर्याप्त नहीं होगी। संबंधित तकनीकी अमले द्वारा जिन-जिन ग्राम पंचायतों में निर्माण कार्यों की स्वीकृति, निरीक्षण, माप या मूल्यांकन किया गया है, उन कार्यों का भी रैंडम भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए।
जनसत्ता एक्सपोज पहले भी उठा चुका है तकनीकी खामियों का मुद्दा
जनसत्ता एक्सपोज द्वारा जिले में लगातार तकनीकी स्वीकृति और निर्माण गुणवत्ता से जुड़े मामलों को सामने लाया जा रहा है। सकरा पंचायत में पुलिया और बाउंड्रीवाल से जुड़े निर्माण कार्यों तथा केशवाही क्षेत्र में विभिन्न निर्माण कार्यों को लेकर भी तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए जा चुके हैं।
अब चाका का सोख पिट इन तमाम मामलों की कड़ी में एक और जमीनी उदाहरण के रूप में सामने है।
क्या तकनीकी स्वीकृति के बाद मौके पर होता है वास्तविक निरीक्षण?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि किसी निर्माण कार्य को तकनीकी स्वीकृति देने के बाद उसकी गुणवत्ता का वास्तविक परीक्षण किस स्तर पर किया जाता है।
क्या मौके पर निर्माण सामग्री, बेस, मोटाई, लंबाई-चौड़ाई और संरचना की मजबूती का परीक्षण किया जाता है?
क्या माप पुस्तिका में दर्ज मात्रा का मौके पर भौतिक सत्यापन होता है?
और सबसे अहम—यदि कार्य पूर्ण दर्ज किया गया है तो चाका का यह सोख पिट टूटकर धंसने की स्थिति में कैसे पहुंचा?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और स्वतंत्र तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है।
कमीशनखोरी के आरोपों की भी हो जांच
बुढ़ार जनपद में विभिन्न विकास कार्यों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों को सही या गलत साबित करना जांच का विषय है। इसलिए प्रशासन को चाहिए कि तकनीकी स्वीकृति से लेकर भुगतान तक की पूरी श्रृंखला की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
यदि कहीं गुणवत्ता से समझौता या वित्तीय अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी, तकनीकी अमला, कार्य एजेंसी और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सिर्फ चाका नहीं, संबंधित पंचायतों के निर्माण कार्यों का भी हो भौतिक सत्यापन
चाका के ₹24 हजार के सोख पिट की तस्वीर को आधार बनाकर संबंधित तकनीकी अमले के कार्यक्षेत्र में आने वाली पंचायतों के निर्माण कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाना चाहिए।
विशेष रूप से खरला के करीब ₹15 लाख के स्टॉप डैम की शिकायत पर हुई कार्रवाई, चाका के सोख पिट की तकनीकी स्वीकृति व माप पुस्तिका तथा सकरा-केशवाही के पूर्व में उठाए गए मामलों की जांच एक साथ कराई जाए तो तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट हो सकती है।
जनसत्ता एक्सपोज का सवाल
अगर चाका का ₹24 हजार का सोख पिट तकनीकी प्रक्रिया के तहत स्वीकृत, मापा और पूर्ण किया गया था, तो बिना पर्याप्त बेस के बना यह ढांचा टूटकर धंस कैसे गया?
और यदि निर्माण में गुणवत्ता की कमी थी, तो तकनीकी निरीक्षण के दौरान इसे क्यों नहीं पकड़ा गया?
अब समय है कि कागजों में पूर्ण विकास कार्यों का जमीन पर भौतिक सत्यापन हो—ताकि सरकारी धन की एक-एक पाई का हिसाब सामने आ सके।
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