"सियासत का अनोखा संगम—शिकायत कांग्रेस की, पैरवी भाजपा के लेटरपैड से! जनपद पंचायत बुढ़ार की शिकायत भोपाल पहुंची तो सवाल भी साथ पहुंच गए—सियासत बदली या सिर्फ़ लेटरपैड?”

जनपद पंचायत बुढ़ार में कथित वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। शिकायत को लेकर समझौते, राजनीतिक संरक्षण और कथित सेटलमेंट की चर्चाओं ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच की प्रक्रिया जारी है।

Aug 6, 2026 - 08:13
Aug 6, 2026 - 08:16
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"सियासत का अनोखा संगम—शिकायत कांग्रेस की, पैरवी भाजपा के लेटरपैड से! जनपद पंचायत बुढ़ार की शिकायत भोपाल पहुंची तो सवाल भी साथ पहुंच गए—सियासत बदली या सिर्फ़ लेटरपैड?”
फाइल फोटो

अतुल सिंह बघेल  / शहडोल 

जनपद पंचायत बुढ़ार की शिकायत ने ऐसा सियासी मोड़ लिया कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा का नया विषय बन गया। शिकायत कांग्रेस के नेता ने उठाई, लेकिन भोपाल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भाजपा के लेटरपैड ने निभा दी। —यह जनहित का नया गठबंधन है या राजनीति का ऐसा अध्याय, जहां विरोध और समर्थन की रेखाएं भी धुंधली पड़ गई हैं। फिलहाल शिकायत से ज्यादा उसके सफर और लेटरपैड की चर्चा है।

"जनपद पंचायत बुढ़ार में कथित करोड़ों के खेल की गूंज भोपाल तक, शिकायत बनी सियासत का नया हथियार!

जनपद पंचायत बुढ़ार में लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ तकनीकी अधिकारियों की कथित मिलीभगत से खेत तालाब, लघु तालाब, मीनाक्षी तालाब सहित विभिन्न हितग्राही मूलक योजनाओं में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं की गईं। शिकायत के अनुसार कई कार्यों में बिना मिट्टी खुदाई कराए फर्जी मूल्यांकन, बिना वास्तविक कार्य के सीसी जारी कर भुगतान, हितग्राहियों की सहमति के बिना दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराना तथा अपने चहेते ठेकेदारों के माध्यम से सरकारी राशि का कथित दुरुपयोग किया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इन अनियमितताओं से शासन को करोड़ों रुपये की आर्थिक क्षति हुई है। पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी वैधानिक कार्यवाही की मांग की गई है।

"जनहित की जांच या सियासी सेटलमेंट? बुढ़ार जनपद का मामला बना चर्चा का विषय”

सूत्रों के हवाले से राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि शिकायत का उद्देश्य केवल जांच कराना था या इसके पीछे किसी संभावित 'सेटलमेंट' की पटकथा भी लिखी जा रही थी। चर्चा यह भी है कि सत्ता पक्ष के लेटरपैड ने इस शिकायत को भोपाल तक पहुंचाकर मानो सियासी 'ईंधन' देने का काम किया। हालांकि पूरे घटनाक्रम ने उस समय नया मोड़ ले लिया, जब मामले की जांच के लिए टीम गठित हुई। इसके बाद शिकायतकर्ता का लगातार जनपद पंचायत बुढ़ार के चक्कर लगाना भी कई तरह की अटकलों को जन्म देने लगा। अब सवाल यही उठ रहे हैं कि यह लड़ाई आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ थी या फिर घटनाक्रम ने कोई दूसरा ही राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया ।

 8 लाख से सुरू 4 लाख में हुआ खत्म सरकारी बोली कि तर्ज़ में हुआ सेटलमेंट।

सूत्रों के मुताबिक शिकायत के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं और आरोप सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों का दावा है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद मामले को आगे बढ़ाने के बजाय समझौते की कोशिशें हुईं। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि शिकायत को वापस लेने या आगे न बढ़ाने के बदले धनराशि की मांग और संभावित लेन-देन को लेकर बातचीत हुई। आठ लाख से सुरु हुआ और चार लाख में तय फिर भी दो दिनों तक चक्कर काटता रहा शिकायत कर्ता । 

"जिसने शिकायत कराई, क्या वही समझौते की पटकथा भी लिख रहा था?”

 स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि शिकायतकर्ता ने अपनी आवाज़ स्वयं उठाई थी या फिर उसे किसी और ने आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। लोगों के बीच यह भी सवाल उठ रहे हैं कि कहीं शिकायतकर्ता केवल एक चेहरा भर तो नहीं था और पर्दे के पीछे कोई दूसरा किरदार पूरी रणनीति तैयार कर रहा था। पूरे घटनाक्रम को कुछ लोग स्थानीय ठेकेदारी और राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर भी देख रहे हैं, सूत्रों ने यह भी बताया है कि समझौते का पाठ्यक्रम उपाध्यक्ष के टेबल पर रचा गया है। समझौते के पीछे अधिकारियों को दबा कर ठेकेदारी तो नहीं है?

"पीड़ित को न्याय मिला या सियासत की सीढ़ी बना दिया गया?”

सबसे बड़ा सवाल उन हितग्राहियों का है, जिन्होंने विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं से परेशान होकर अपनी पीड़ा जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाई थी। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी शिकायत निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई का आधार बनेगी। लेकिन अब घटनाक्रम को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच यह सवाल भी गूंजने लगा है कि कहीं उनकी पीड़ा महज राजनीतिक हथियार तो नहीं बन गई। जिन लोगों ने न्याय की उम्मीद में आवाज उठाई, कहीं वही सियासी दांव-पेच का माध्यम बनकर तो नहीं रह गए। आखिर पीड़ितों को न्याय मिलेगा या उनकी शिकायत केवल राजनीतिक शोर-शराबे तक सीमित रह जाएगी—यह सवाल आज भी जवाब मांग रहा है।

शेष अगले अंक में 

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