सीसी रोड से घाट तक ‘अदृश्य मजदूर’! केशवाही पंचायत के कामों की जांच की मांग
जनपद पंचायत बुढ़ार की ग्राम पंचायत केशवाही में करोड़ों रुपये के विभिन्न विकास कार्यों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सीसी रोड, पेवर ब्लॉक और घाट निर्माण सहित कई कार्यों में मजदूरों की वास्तविक मौजूदगी को लेकर शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। आरोप है कि कामों में मजदूर नजर नहीं आए, जबकि अभिलेखों में श्रम कार्य और भुगतान दर्ज है। महीनों से शिकायतों के बाद अब मामला कलेक्टर पार्थ जैसवाल और जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति तक पहुंचने की उम्मीद है। 11 सितंबर को खाम्हीडोल सेक्टर में होने वाले जनविश्वास कार्यक्रम में भी शिकायतकर्ता मामला उठाने की तैयारी में हैं।
करोड़ों के काम, मजदूर ‘अदृश्य’… कागजों में चलता रहा विकास का पहिया, शिकायत पत्रों ने संभाली मोर्चेबंदी
शहडोल। जनपद पंचायत बुढ़ार की ग्राम पंचायत केशवाही में विकास की ऐसी कहानी सामने आ रही है, जो सामान्य पंचायत व्यवस्था से बिल्कुल अलग नजर आती है। ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं के आरोपों पर गौर करें तो यहां सीसी रोड से लेकर पेवर ब्लॉक और घाट निर्माण तक काम तो हुए, भुगतान भी हुआ, लेकिन कई कार्यों में मजदूरों की मौजूदगी पर ही बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
यानी सामग्री दिखाई देती है, भुगतान दिखाई देता है, लेकिन जिन हाथों से निर्माण होना था, उन मजदूरों का हिसाब मौके पर तलाशना मुश्किल बताया जा रहा है।
मजदूर कम, कागज ज्यादा?
पंचायत के विभिन्न निर्माण कार्यों को लेकर शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिन कार्यों में बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता थी, उनमें मौके पर उतनी संख्या में मजदूर नहीं लगाए गए। इसके बावजूद यदि मस्टर रोल में श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज कर मजदूरी का भुगतान किया गया है तो यह जांच का गंभीर विषय है।
मामला सिर्फ मजदूरों का नहीं है। सवाल यह भी है कि मस्टर रोल में दर्ज नामों ने वास्तव में काम किया या फिर कागजों पर ही श्रम पूरा हो गया?
इसका जवाब पंचायत के मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान, बिल-वाउचर, एमबी और मौके के भौतिक सत्यापन से ही सामने आ सकता है।
काम करोड़ों का, शिकायतों की गिनती भी कम नहीं!
केशवाही पंचायत में लंबे समय से अलग-अलग निर्माण कार्यों को लेकर शिकायतें किए जाने की बात सामने आ रही है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वे महीनों से शिकायत पत्र लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक अपेक्षित न्याय नहीं मिला।
हालात पर तंज कसते हुए शिकायतकर्ताओं का कहना है—
“जिन कामों में मजदूर नजर नहीं आए, उन कामों की शिकायतों ने जरूर खूब काम किया।”
अब सवाल यह है कि अगर शिकायतें लगातार पहुंच रही हैं तो उनका निष्पक्ष और समयबद्ध निराकरण क्यों नहीं हुआ?
जांच व्यवस्था पर ही उठे सवाल
मामले में जनपद पंचायत की जांच व्यवस्था भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिस व्यवस्था और जिम्मेदारी से जुड़े लोगों के खिलाफ शिकायतें की गईं, उन्हीं से जुड़ी जांच प्रक्रिया पर भरोसा करना मुश्किल है।
यही वजह है कि शिकायतकर्ता अब जिला स्तर से निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
अब कलेक्टर और जिला सीईओ से उम्मीद
जनसत्ता एक्सपोज की टीम से बातचीत में शिकायतकर्ताओं ने कहा कि “अब न्याय कलेक्टर पार्थ जैसवाल और जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति के हाथों में है।”
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वे लगातार अपनी शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचा रहे हैं और अब उन्हें उम्मीद है कि जिला स्तर से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।
11 सितंबर को जनविश्वास कार्यक्रम में गूंजेगा केशवाही का मामला
मुख्यमंत्री के जनविश्वास कार्यक्रम के तहत 11 सितंबर को खाम्हीडोल सेक्टर में कार्यक्रम प्रस्तावित है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वे बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों के साथ वहां पहुंचकर विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़े शिकायत पत्र अधिकारियों को सौंपेंगे।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जनविश्वास कार्यक्रम में पहुंचने वाली शिकायतों पर प्रशासन क्या रुख अपनाता है और क्या केशवाही पंचायत के कार्यों की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।
सबसे बड़ा सवाल—मजदूर गए कहां?
केशवाही पंचायत के मामले में अब कई सवाल एक साथ खड़े हैं—
क्या मस्टर रोल में दर्ज सभी मजदूरों ने वास्तव में काम किया?
क्या मजदूरी का भुगतान वास्तविक श्रमिकों को हुआ?
क्या बिल-वाउचर में दर्ज सामग्री वास्तव में मौके पर लगी?
क्या एमबी में दर्ज कार्य मौके पर उसी मात्रा और गुणवत्ता में मौजूद हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर काम जमीन पर हुआ है तो उसका पूरा हिसाब कागज और मौके पर एक जैसा क्यों नहीं दिख रहा?
जनसत्ता एक्सपोज की पड़ताल जारी
केशवाही पंचायत में विकास कार्यों और उनसे जुड़े दस्तावेजों की जनसत्ता एक्सपोज की टीम गहन पड़ताल कर रही है। मस्टर रोल से लेकर एमबी, बिल-वाउचर और भुगतान अभिलेखों तक दस्तावेजों का मिलान किया जाएगा।
अगले अंक में कोशिश होगी कि आरोपों और दावों से आगे बढ़कर दस्तावेजों के आधार पर यह सामने रखा जाए कि केशवाही पंचायत में विकास की असली तस्वीर क्या है—और आखिर कागजों में दिखाई देने वाले मजदूर जमीन पर कितने मौजूद थे।
फिलहाल केशवाही का सवाल यही है—
“विकास के काम हुए हैं तो मजदूरों का हिसाब इतना अदृश्य क्यों है?”
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