हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर

हर्री पंचायत में डीएमएफ मद से करीब 25 लाख रुपये की लागत से स्वीकृत 575 मीटर सीसी सड़क निर्माण के महज 25 दिन बाद ही टूटने की स्थिति में पहुंच गई। वहीं मनरेगा से बनी ग्रेवल सड़क की बदहाल स्थिति को लेकर भी ग्रामीण प्रतिनिधि कलेक्टर से शिकायत की तैयारी में थे। नई सीसी सड़क की गुणवत्ता, 575 मीटर की स्वीकृति और सूचना पटल पर दर्ज 515 मीटर लंबाई को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

Sep 7, 2026 - 22:17
Sep 7, 2026 - 22:31
 0  47
हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर
टूटी सड़क
हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर
हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर
हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर
हर्री पंचायत में विकास की अनोखी तस्वीर! ग्रेवल रोड पहले ही सवालों में, अब 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में बिखरने की कगार पर

अतुल सिंह बघेल  /  मध्यप्रदेश 

हर्री में 25 लाख की सीसी सड़क 25 दिन में ही टूटने लगी, निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल

मनरेगा से बनी ग्रेवल सड़क की बदहाली को लेकर ग्रामीण प्रतिनिधि कलेक्टर को सौंपने वाले थे शिकायत, उससे पहले नई सीसी सड़क ने भी खड़े कर दिए बड़े सवाल

शहडोल। बुढार जनपद पंचायत अंतर्गत हर्री पंचायत में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर सवाल अब एक सड़क तक सीमित नहीं रह गए हैं। मनरेगा से बनाई गई ग्रेवल सड़क की खराब स्थिति को लेकर ग्रामीण प्रतिनिधि जिला कलेक्टर को शिकायत सौंपने की तैयारी में थे, लेकिन इसी बीच करीब 25 लाख रुपये की लागत से बनी नई सीसी सड़क भी निर्माण के महज 25 दिन में ही टूटने की कगार पर पहुंच गई। ऐसे में पंचायत में लाखों रुपये खर्च कर कराए जा रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

एक सड़क की शिकायत लेकर जाने वाले थे, दूसरी सड़क ने भी बढ़ाई चिंता

मनरेगा से बनी ग्रेवल सड़क की स्थिति पहले से ही ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई थी। ग्रामीण प्रतिनिधियों द्वारा इसकी स्थिति और निर्माण कार्य से जुड़े बिंदुओं को लेकर कलेक्टर के समक्ष शिकायत रखने की तैयारी की जा रही थी। इसी बीच नई सीसी सड़क की तस्वीरें सामने आने से मामला और गंभीर हो गया है।

एक तरफ मनरेगा की ग्रेवल सड़क की बदहाली और दूसरी तरफ डीएमएफ मद से करीब 25 लाख रुपये की लागत से बनी सीसी सड़क का महज 25 दिन में टूटना पंचायत में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

तस्वीरें खुद बता रही सड़क की हालत

मौके की तस्वीरों में सड़क के किनारे कई जगह इस तरह टूटकर ढहते दिखाई दे रहे हैं, जैसे मिट्टी की दीवार बारिश के पानी से भरभराकर गिर रही हो। टूटे हुए हिस्से में रेत और गिट्टी साफ दिखाई दे रही है, जबकि सीमेंट की बाइंडिंग बेहद कमजोर नजर आ रही है। वहीं सड़क के बीच से भी गिट्टियां बाहर निकलने लगी हैं।

बारिश की शुरुआती फुहारों के बाद ही सड़क की यह स्थिति सामने आना अपने आप में गंभीर सवाल है। करीब 25 लाख रुपये की लागत वाली सड़क यदि निर्माण के महज 25 दिन बाद ही टूटने लगे तो निर्माण के दौरान गुणवत्ता के निर्धारित मापदंडों का कितना पालन किया गया, यह जांच का विषय है।

575 मीटर की स्वीकृति, सूचना पटल पर 515 मीटर

नई सीसी सड़क के मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहा है। जानकारी के अनुसार डीएमएफ मद से करीब 25 लाख रुपये की लागत से 575 मीटर सीसी सड़क की स्वीकृति हुई है, जबकि मौके पर लगाए गए सूचना पटल पर सड़क की लंबाई 515 मीटर दर्ज है।

यानी स्वीकृत लंबाई और सूचना पटल पर दर्ज लंबाई में 60 मीटर का अंतर है। आखिर 575 मीटर की स्वीकृति के बावजूद सूचना पटल पर 515 मीटर क्यों दर्ज किया गया? वास्तविक निर्माण कितने मीटर हुआ, इसका जवाब मौके की स्वतंत्र नाप और विभागीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

क्रेशर मैटेरियल पर भी सवाल

सड़क निर्माण में इस्तेमाल किए गए क्रेशर मैटेरियल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि निर्माण में जीरा यानी करीब 6 एमएम की गिट्टी तथा ऊपरी परत में 30 एमएम गिट्टी को मिक्स कर ढलाई की गई है। सड़क की मौजूदा स्थिति में गिट्टियों का बाहर निकलना यह सवाल खड़ा कर रहा है कि निर्माण में निर्धारित मिश्रण और सीमेंट की मात्रा का पालन किया गया था या नहीं।

इसकी वास्तविक स्थिति तकनीकी जांच, टीएस, प्राक्कलन और एमबी के मिलान के साथ निर्माण सामग्री की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

सूचना पटल भी सवालों के घेरे में

लाखों रुपये के निर्माण कार्य की जानकारी देने के लिए अलग सूचना पटल लगाने के बजाय यहां एक मकान की दीवार पर ही निर्माण संबंधी जानकारी लिखी गई है। इसी पर सड़क की लंबाई 515 मीटर दर्ज है, जबकि स्वीकृत लंबाई 575 मीटर बताई जा रही है। सूचना पटल और स्वीकृति के आंकड़ों में अंतर भी जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल, जिस पर शिकायत उसी से जांच क्यों?

हर्री का मामला जिले में निर्माण कार्यों की शिकायतों की जांच की व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब कोई ग्रामीण या पीड़ित किसी निर्माण कार्य की गुणवत्ता, माप, तकनीकी स्वीकृति या निर्माण में अनियमितता को लेकर शिकायत करता है तो कई बार जांच उन्हीं तकनीकी अधिकारियों के माध्यम से कराई जाती है, जो उसी निर्माण कार्य की तकनीकी निगरानी से जुड़े होते हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि जिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर शिकायतकर्ता सवाल उठा रहा है, उसी व्यवस्था के अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी देने से निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी?

यदि निर्माण की तकनीकी निगरानी की जिम्मेदारी किसी अधिकारी की रही है और बाद में उसी निर्माण की गुणवत्ता पर शिकायत होती है, तो उसी अधिकारी या उसी तकनीकी तंत्र से जांच कराने के बजाय स्वतंत्र तकनीकी टीम से जांच कराया जाना ज्यादा उचित होगा।

जनसत्ता एक्सपोज लगातार उठा रहा टीएस और तकनीकी स्वीकृति का सवाल

जनसत्ता एक्सपोज की टीम पंचायतों में होने वाले निर्माण कार्यों की तकनीकी स्वीकृति, टीएस, प्राक्कलन, एमबी और मौके पर हुए वास्तविक निर्माण के बीच तालमेल को लेकर लगातार सवाल उठाती रही है। इसके बावजूद यदि लाखों रुपये के निर्माण कार्य महज कुछ दिनों में ही अपनी गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े करने लगें तो यह संबंधित तकनीकी अमले और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।

सूत्रों के मुताबिक निर्माण कार्यों में नियमित साइट इंस्पेक्शन और गुणवत्ता की निगरानी के बजाय कथित कमीशन के खेल को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में निष्पक्ष तकनीकी जांच के जरिए पूरे मामले की वास्तविकता सामने आना जरूरी है।

 कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ के पास ग्रेवल सड़क मामले की शिकायत से पहले सीसी सड़क ने भी खोल दी पोल 

ग्रामीण प्रतिनिधि मनरेगा से बनी ग्रेवल सड़क की स्थिति को लेकर कलेक्टर के सामने अपनी बात रखने की तैयारी में थे। इसी बीच नई सीसी सड़क की महज 25 दिन में सामने आई हालत ने मामले को और बड़ा कर दिया है।

अब सवाल केवल पुरानी ग्रेवल सड़क का नहीं है। सवाल यह भी है कि डीएमएफ की राशि से बनी करीब 25 लाख रुपये की नई सीसी सड़क इतनी जल्दी खराब क्यों होने लगी?

प्रशासन के सामने सीधे सवाल

क्या 575 मीटर की स्वीकृत सड़क वास्तव में 575 मीटर बनी?

सूचना पटल पर 515 मीटर क्यों दर्ज किया गया?

स्वीकृति और सूचना पटल के बीच 60 मीटर का अंतर क्यों है?

25 दिन में सड़क के किनारे टूटने और गिट्टियां बाहर निकलने की वजह क्या है?

क्या निर्माण के दौरान नियमित तकनीकी निरीक्षण किया गया था?

क्या सड़क की गुणवत्ता और इस्तेमाल सामग्री का तकनीकी परीक्षण कराया गया?

और सबसे अहम सवाल, शिकायत की जांच उसी तकनीकी तंत्र से क्यों कराई जाए, जिस पर निर्माण की निगरानी की जिम्मेदारी थी?

डीएमएफ की राशि जनता के विकास के लिए खर्च होने वाली सार्वजनिक निधि है। ऐसे में 25 लाख रुपये की सड़क यदि महज 25 दिन में ही टूटने की कगार पर पहुंच जाए तो इसे सामान्य निर्माण दोष मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराए और यदि निर्माण में अनियमितता या लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करते हुए नियमानुसार कार्यवाही की जाए।

हर्री में पहले मनरेगा की ग्रेवल सड़क सवालों में थी, अब डीएमएफ से बनी सीसी सड़क भी सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीणों की नजर अब जिला प्रशासन की जांच और कार्यवाही पर है।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0