"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"

ग्राम पंचायत खरला में 15 लाख के स्टॉप डैम और 10 लाख के घाट निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतों के बाद संबंधित हिस्सों पर प्लास्टर किए जाने से ग्रामीण स्वतंत्र तकनीकी जांच, गुणवत्ता परीक्षण और वित्तीय ऑडिट की मांग कर रहे हैं।

Jul 17, 2026 - 22:33
Jul 17, 2026 - 22:38
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"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"
खुली परत स्टाप डैम
"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"
"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"
"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"
"स्टॉप डैम में गिट्टी की खिड़कियां, घाट पर प्लास्टर का पर्दा! शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, तकनीकी निरीक्षक पर उठे सवाल"

शहडोल/बुढ़ार | अतुल सिंह बघेल!

जनसत्ता एक्सपोज़ विशेष

ग्राम पंचायत खरला में विकास कार्यों की तस्वीर अब सवालों के घेरे में है। 15 लाख रुपये की लागत से बने स्टॉप डैम और लगभग 10 लाख रुपये के घाट निर्माण में पहले जिन स्थानों पर कंक्रीट के बीच गिट्टी खुली दिखाई दे रही थी, वहां अब प्लास्टर दिखाई दे रहा है। इससे ग्रामीणों के बीच यह चर्चा है कि क्या तकनीकी मानकों के अनुसार सुधार किया गया या केवल बाहरी सतह को ठीक कर दिया गया।

तकनीकी निरीक्षण हुआ था या सिर्फ़ औपचारिकता निभाई गई? क्योंकि जहां जनता को गिट्टी दिखी, वहां निरीक्षण में सब कुछ मानकों पर बताया गया।"

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे, तब संबंधित हिस्सों पर प्लास्टर कराया गया। अब ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि केवल इस निर्माण की नहीं, बल्कि पंचायत में हाल के वर्षों में हुए सभी निर्माण कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। जानकारी देने पर भी कार्य प्रभावित नहीं हुआ और ना ही जांच बल्कि प्लास्टर की लीपापोती कर दी गई और बाकायदा पालिश पुट्टी कर श्रंगार कर दिया गया ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कमिशन के आगे आँख कुछ देख नहीं पाती या फिर लोगों को अंधेरे में धकेल दिया जाता है 

ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य शुरुआत से ही गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हुए हैं, तो फिर शिकायत के बाद मरम्मत या प्लास्टर की आवश्यकता क्यों पड़ी? उनका मानना है कि इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष तकनीकी जांच से ही मिल सकता है।

अब सवाल केवल स्टॉप डैम और घाट तक सीमित नहीं हैं। पंचायत में सीसी सड़क, पुलिया, नाली, तालाब, सामुदायिक भवन और अन्य विकास कार्यों की गुणवत्ता पर भी ग्रामीण प्रश्न उठा रहे हैं। मांग की जा रही है कि संबंधित तकनीकी अधिकारियों के निरीक्षण, मापन पुस्तिका (एमबी), गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, सामग्री उपयोग के अभिलेख और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की भी जांच की जाए।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि पंचायत में सरकारी धन से हुए कार्यों में प्रशासनिक व्यय और निर्माण व्यय का अनुपात भी जांच का विषय होना चाहिए। संबंधित वित्तीय वर्षों में प्रशासनिक मद में कितना व्यय किया गया और क्या वह निर्धारित नियमों के अनुरूप था, इसकी भी स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।

ग्रामीणों के सवाल

शिकायत के बाद जिन हिस्सों पर प्लास्टर किया गया, उसकी तकनीकी आवश्यकता क्या थी?

क्या किसी सक्षम अधिकारी ने गुणवत्ता परीक्षण कराया?

निर्माण कार्यों का तकनीकी निरीक्षण समय-समय पर हुआ था या नहीं?

पंचायत के अन्य विकास कार्यों की गुणवत्ता भी स्वतंत्र एजेंसी से क्यों न जांची जाए?

सरकारी धन से हुए कार्यों में प्रशासनिक व्यय नियमानुसार हुआ या नहीं?

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